मातृ मंदिर कन्या गुरुकुल

चरित्र · संस्कार · आत्मनिर्भरता

✦ रोटरी क्लब कबीर वाराणसी द्वारा सप्रेम भेंट ✦

12वींतक मान्यता प्राप्त
16वैदिक संस्कार
प्रतिदिनप्रातः-सायं यज्ञ

गुरुकुल का परिचय

गुरुकुल परम्परा अति प्राचीन है, क्योंकि विद्यार्थी जीवन ज्ञान व शक्ति के संचय का काल है। गुरुकुलों में ही सर्वांगीण विकास सम्भव है।

यह गुरुकुल केवल शिक्षा का केन्द्र नहीं, बल्कि मातृत्व, सादगी, अनुशासन और वैदिक जीवन दर्शन का जीवंत उदाहरण है। यहाँ छात्राओं को वैदिक, नैतिक, आधुनिक एवं व्यावहारिक शिक्षा का समन्वित प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे समाज में आदर्श नारी बन सकें।

हमारा संकल्पबालिकाओं में चरित्र, आत्मनिर्भरता और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा संस्कार विकसित करना।
मान्यता / पंजीकरण
उ.प्र. माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद, लखनऊ — उत्तर मध्यमा (12वीं) तक मान्यता प्राप्त

हमारी आचार्या

प

आचार्या डॉ. पुष्पावती जी

संस्थापिका · स्मृतिशेष

स्मृतिशेष आचार्या डॉ. पुष्पावती जी का जन्म 15 अक्टूबर 1952 को पटियाला (पंजाब) के एक प्रतिष्ठित परिवार में माता कलावती व पिता ऋषिराम गुप्ता के यहाँ हुआ था।

आपने संस्कृत व अंग्रेज़ी में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विद्यावारिधि (पी.एच.डी.) सम्पन्न किया।

पूज्य आचार्या जी ने मातृ मंदिर कन्या गुरुकुल की स्थापना सन 1955 में की थी। इसकी सम्बद्धता उ.प्र. माध्यमिक शिक्षा संस्कृत परिषद, लखनऊ से उत्तर मध्यमा (12वीं) कक्षा तक मान्यता प्राप्त है।

ग

डॉ. गायत्री आर्या जी

वर्तमान आचार्या

आपका जन्म 5 फरवरी 1977 को ग्राम व पोस्ट सलिखा, जिला रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के एक प्रतिष्ठित आर्य परिवार में हुआ।

आपके माता-पिता स्मृतिशेष श्रीमती किया देवी व श्री धर्मसिंह आर्य (स्वामी धर्मानन्द सरस्वती) जी ने आजीवन वैदिक मिशनरी का बृहद कार्य किया, जिसके अन्तर्गत असंख्य ईसाइयों का शुद्धिकरण करके आर्य समाज में सम्मिलित किया, जो अत्यन्त दर्शनीय है।

डॉ. गायत्री आर्या जी ने आचार्या डॉ. पुष्पावती जी के सानिध्य में प्रथम से पी.एच.डी. पर्यन्त अध्ययन किया। आपकी रुचि एवं निष्ठा प्रारम्भ से ही गुरुकुलीय शिक्षा के प्रति थी; अतः गुरुकुल को जीवन समर्पित करते हुए पूर्ण रूप से गुरुकुल संचालन में संलग्न हैं।

गुरुकुल की विशेषताएँ

  • छात्राओं के सर्वांगीण विकास हेतु आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनुकूल छात्रावास।
  • प्राचीन शिक्षा में आर्य ग्रन्थ, पाणिनीय अष्टाध्यायी, वेद, वेदाङ्ग एवं आधुनिक शिक्षा का समन्वय।
  • संस्कार, योग, संगीत एवं आत्मरक्षा का प्रशिक्षण।
  • अनुभवी एवं समर्पित शिक्षकों द्वारा संचालन।
  • “अग्रशिक्षा प्रणाली”— बड़ी कन्याएँ स्वयं पढ़कर छोटी कन्याओं को पढ़ाती हैं।

वैदिक नित्य कर्म

  • प्रतिदिन नियमित रूप से प्रातः, सायं संध्या एवं अग्निहोत्र (चतुर्वेद पारायण यज्ञ)।
  • विशेष पर्वों पर विशिष्ट आहुतियों से यज्ञ का आयोजन।
  • रविवासरीय सत्संग एवं राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु विभिन्न विषयों पर परिचर्चा।
  • वार्षिक कार्यक्रम — भारतीय पर्वों व राष्ट्रीय पर्वों को वैदिक पद्धति के अनुसार मनाया जाता है।
  • प्रतिवर्ष वार्षिकोत्सव का आयोजन बृहद रूप से किया जाता है।

फ़ोटो गैलरी

प्रवेश नियम

  • गुरुकुल में 5 से 12 वर्ष की कन्याओं का प्रवेश लिया जाता है।
  • उन्हीं कन्याओं को प्रवेश दिया जायेगा जिनके माता-पिता व कन्या संस्कारित हों तथा गुरुकुलीय नियमों व अनुशासन के पालन में अभिरुचि रखते हों।
प्रवेश हेतु संपर्क करें →

संस्कार एवं विशेष यज्ञ

गुरुकुल में पूर्ण वैदिक विधि से सोलह संस्कार एवं जन्मदिवस, वैवाहिक वर्षगाँठ आदि विशेष अवसरों पर विशेष यज्ञ सम्पन्न कराये जाते हैं।

यज्ञ / संस्कार हेतु संपर्क करें →

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